सम्प्रेषण का अर्थ? What is Communication?

सम्प्रेषण का अर्थ? What is Communication?

मित्रों आज हम जानने वाले हैं (Meaning Of Communication) मित्रों आपको यहाँ पूरी जानकारी के लिए आप हमारे पोस्ट को पूरा पढ़ें यहाँ पूरी जानकारी दी गई है।

सम्प्रेषण का अर्थ? (Meaning Of Communication)

सम्प्रेषण का अर्थ है किसी विचार अथवा सन्देश (Massage) को एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रेषित(Send) करने वाले के द्वारा भेजना तथा प्राप्त करने वाले के द्वारा प्राप्त करना।

प्रेषण सफल तभी कहा जा सकता है कि जब दोनों अर्थात प्रेषितकर्ता (Sender) तथा प्राप्त कर्ता (Receiver) समान रूप से उत्तरदाई होते हैं ।

इस प्रकार सम्प्रेषण की क्रिया द्विपक्षीय अथवा बहुपक्षीय प्रक्रिया है , साथ ही सहयोगात्मक प्रक्रिया भी है।

सम्प्रेषण कि प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

1-जॉन डीवी (John Dewey) के अनुसार –

“सम्प्रेषण अनुभवों के आदान-प्रदान की वह प्रक्रिया है जिसके परिणाम स्वरूप दोनों सहभागियों में परस्पर लाभ के लिए परिवर्तन होता है।”

अतः इस परिभाषा से हमें पता चलता है कि सम्प्रेषण लाभ के लिए किया जाता है।

2-एडगर डेल (Edger Dale) के अनुसार-

“सम्प्रेषण ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विचारो तथा भावनाओं का परस्पर आदान – प्रदान लाभ के लिए होता है।”

3-डी0 बरलो (D. Berlo) के अनुसार-

“सम्प्रेषण प्रेषण कर्ता तथा प्राप्तिकर्ता के बीच विचारों कि अन्तः क्रिया कि एक प्रक्रिया है जिससे परस्पर लाभ हेतु दोनों में समझदारी बढ़ती है।”

4-अरस्तू (Aristotle) के अनुसार-

“सम्प्रेषण ऐसा माध्यम है कि एक व्यक्ति दूसरे को इस प्रकार प्रभावित कर सके ताकि वांछित उद्देश्य की प्राप्ति हो सके।”

5- विलियम सचरम के अनुसार-

“सम्प्रेषण में वे सारे तरीके आ जाते हैं जिनसे सूचनाओं का आदान – प्रदान होता है।”

सम्प्रेषण का अर्थ? What is Communication?

What is Communication?

सम्प्रेषण प्रक्रिया के तत्व-(Element of Communication Process)

सम्प्रेषण प्रक्रिया के निम्नलिखित तत्व हैं-

1-सम्प्रेषण स्रोत–

सम्प्रेषण स्रोत से मतलब व्यक्ति तथा समूह विशेष से होता है जो अपने विचारों और भावों को दूसरों तक प्रेषित करना चाहते हैं।

2-सम्प्रेषण सामग्री-

सम्प्रेषण कर्ता के विचार या भाव सम्प्रेषण की सामग्री कहलाती है।

3-सम्प्रेषण माध्यम-

सम्प्रेषण माध्यम कई प्रकार के होते हैं जैसे- शाब्दिक, लिखित, संकेतांक।

4-अनुक्रियात्मक सामग्री –

प्राप्तिकर्ता द्वारा प्रेषित सामग्री के प्रति अनुक्रिया।

5-सम्प्रेषण में सहायक तथा बाधक तत्व –

सम्प्रेषण की अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियाँ ।

सम्प्रेषण के प्रकार माध्यम की दृष्टि से तथा परिस्थितियों के अनुसार नीचे दिये जा रहे हैं

सम्प्रेषण की प्रभावशीलता का अर्थ

सम्प्रेषण की प्रभावशीलता का अर्थ उसके द्वारा होने वाले लाभों से है जिनकी प्राप्ति के लिए सम्प्रेषण को सम्पन्न किया जाता है। प्रमुख रूप से सम्प्रेषण की सफलता का मापदंड इससे प्राप्त आदान-प्रदान के मूल्यों से है। अर्थात आदान-प्रदान की गुणवत्ता कैसी है? सम्प्रेषणकर्ता तथा सम्प्रेषण प्राप्तिकर्ता के बीच कितना सामाजिक विकास हो पता है?

सम्प्रेषण का अर्थ? What is Communication?

प्रभावशाली सम्प्रेषण प्रक्रिया के तत्व

(1) सम्प्रेषण स्रोत की सशक्तता ।

(2) सम्प्रेषण सामग्री की प्रभावशीलता ।

(3)सम्प्रेषण माध्यम में भिन्नता, यथार्थता, नवीनता, पूर्णता, रोचकता एवं औचित्यता ।

(4)प्राप्तिकर्ता की क्रियाशीलता, तर्क शक्ति, दूसरे के विचारों तथा भावों का सम्मान करने की इच्छाशक्ति, पर्याप्त शब्दावली ।\

सम्प्रेषण में सहायक तत्व –

सम्प्रेषण को प्रभावशाली बनाने के लिए उपयुक्त सम्प्रेषण परिस्थितियों तथा वातावरण का महत्वपूर्ण स्थान होता है । जैसे कक्षा में पर्याप्त रोशनी का होना, उचित मात्रा में फर्नीचर, गर्मी से बचने के लिए पंखे आदि ।

साथ ही उचित मनोवैज्ञानिक वातावरण भी होना चाहिए ।

सम्प्रेषण में असहायक तत्व –

सम्प्रेषण को प्रभावकारी न बनाने में निम्नलिखित बाधक तत्व हैं-

(1)सम्प्रेषण सामग्री की कमियाँ –

सम्प्रेषण सामग्री का आवश्यकतानुसार न होना, अधूरा होना, अव्यवस्थित होना, विचारों में तारतम्य न होना, नवीनपन का अभाव, पुराने तथ्य आदि।

(2)सम्प्रेषण प्राप्तिकर्ता सम्बन्धी कमियाँ –

उचित योग्यता का अभाव, शारीरिक तथा मानसिक अस्वस्थता, आवश्यक रूचि की कमी।

(3)प्रेषणकर्ता में कमियाँ –

रुचि का अभाव, उत्साह की कमी, प्रबल सम्प्रेषण विधि का अभाव आदि।

(4)सम्प्रेषण माध्यम की कमियाँ –

कठिन भाषा का प्रयोग, अनुपयुक्त संकेत, दृश्य- श्रव्य साधनो का अभाव ।

(5)वातावरण सम्बन्धी कमियाँ –

मौसम की प्रतिकूलता, सुबिधाओं का अभाव जैसे – उचित प्रकाश, वायु, पानी, बिजली आदि। उचित मनोवैज्ञानिक वातावरण का अभाव ।

प्रभावी सम्प्रेषण के सिद्धान्त

(1)तत्परता का सिद्धान्त –

सम्प्रेषण प्राप्तकर्ता की सम्प्रेषण सामग्री में रुचि का होना आवश्यक है। सम्प्रेषण तभी प्रभावी बन सकता है जब उसको प्राप्त करने के लिए सम्प्रेषण प्राप्तिकर्ता पूरी तरह से तैयार हो।

तत्परता के नियम (Law of Readiness) के नियम के नाम से प्रसिद्ध यह अधिगम का एक सर्वविदित नियम है। इस नियम को प्रतिपादित करते हुए थोर्नडाइक ने स्पष्ट किया की इस प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेने हेतु किस सीमा तक तैयार है।

तत्परता सम्बन्धी इस नियम के माध्यम से उसने अधिगम को निर्धारित अथवा प्रभावित करने में तत्परता की भूमिका को निम्न प्रकार रखा है -यदि कोई अधिगमकर्ता अधिगम के लिए पूर्ण रूप से तत्पर है उसे अधिगम अथवा सीखने में पूर्ण आनंद, सन्तोष तथा संतुष्टि की प्राप्ति होती है और परिणाम स्वरूप उसका आधिगम अपने निश्चित लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल होता है। परन्तु किसी कारणवश अगर कोई अधिगमकर्ता सीखने के लिए तत्पर नहीं है तो उसे ज़ोर-जबरदर्स्ती करके सिखाने के परिणाम अच्छे नहीं निकलते ।

यदि बालक भाषा सीखने के लिए तत्पर है तभी भाषा सिखायी जा सकती है। सामने बैठा हुआ बालक एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता है, यदि वह तत्पर नहीं हैं। तत्परता निम्न प्रकार से प्रभावित होती है –

(1)तत्परता अधिगमकर्ता को ग्रहण करने के प्रति उचित रूप से आकर्षित करने की क्षमता रखती है

(2)तत्परता से अधिगम लक्ष्य निर्देशित तथा प्रयोजनपूर्ण बनी रहती है ।

(3)तत्परता के परिणाम स्वरूप अपने आपको अधिगम प्रक्रिया के लिए उचित रूप तैयार कर लेते हैं व शारीरिक तथा मानसिक रूप से पूरी से पूरी सजन, क्रियाशील एवं चुस्त बना लेते हैं।

(4)तत्परता अधिगम प्रक्रिया में समुचित ध्यान बनाए रखने में सहयोगी सिद्ध होती है ।

(5)तत्परता से छात्रों में सीखने के प्रति उचित संकल्प, आत्मविश्वास तथा दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता है।

(6)तत्परता छात्र में सीखने की प्रक्रिया के प्रति उचित सकारात्मक दृष्टिकोण बनाने में सहयोग करती है।

(7)तत्परता सीखने में छात्र की पर्याप्त रूचि बनाए रखती है।

(8)तत्परता छात्र में सीखने की प्रक्रिया के प्रति उचित सकारात्मक दृष्टिकोण बनाने में सहयोग करती है।

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