Socially Maladjusted Children सामाजिक असमायोजित बालक

Socially Maladjusted Children सामाजिक असमायोजित बालक

Socially Maladjusted Children सामाजिक असमायोजित बालक , मित्रों आज की इस पोस्ट में हम बात करेंगे सामाजिक और असमायोजित बालकों के बारे में दोस्तों पूरी जानकारी के लिए पोस्ट को शुरू से लेकर अंत तक जरूर पढ़ें अगर आप डीएलएड के किसी भी सेमेस्टर में हैं या फिर यूपीटेट सीटेट सुपर टेट कुछ भी कर रहे हैं तो यह पोस्ट आपके लिए बेहद जरूरी है|

सामाजिक असमायोजित बालकों का अर्थ एवं परिभाषा

असमायोजित का तात्पर्य है वह बालक जो समायोजन करने में असफल रहते हैं। अपराधी, समाज विरोधी व आक्रामक व्यवहार करते हैं। अंग्रेजी में Mal का अर्थ है अवांछित अतः असमायोजन का अर्थ है अवांछित सामंजस्य। जब एक बालक का व्यवहार उसकी अपनी उन्नति तथा अन्य लोगों की उन्नति में बाधक नहीं होता तो उसे सामान्य व उचित व्यवहार कहते हैं। जब उसके व्यवहार जैसे- अत्यधिक दिव्य स्वप्न उसके सीखने को प्रभावित करते हैं , तथा अन्य व्यक्तियों को भी प्रभावित करते हैं जैसे- झूठ बोलकर या चोरी करके तब इसे सामाजिक असामंजस्य कहते हैं।

Socially Maladjusted Children सामाजिक असमायोजित बालक

बालकों का व्यवहार भिन्न प्रकार का हो सकता है। या तो वह छोटे-छोटे अवांछित कार्य कर सकते हैं या अपराधी श्रेणी के हो सकते हैं। अपराध का कारण मानसिक द्वंद तथा संवेगात्मक कमजोरी हो सकती है। स्कूलों में प्रायः अध्यापकों को सामाजिक रुप से और असमायोजित बालक से सहानुभूति होनी चाहिए। उन्हें उनका अध्ययन करना चाहिए दंड नहीं देना चाहिए।

Socially Maladjusted Children सामाजिक असमायोजित बालक
Socially Maladjusted Children सामाजिक असमायोजित बालक

सामाजिक और असमायोजित बालकों की विशेषताएं

1- सामान्य विशेषताऐं

प्रायः ऐसे बालक अपने आपको समाज में सहानुभूतिरहित, बिना न्याय के सजा पाने वाले समझते हैं। वह यह समझते हैं कि उन्हें मानव के रूप में अभी अधिकार प्राप्त नहीं है। ऐसे बालक अपने को अवांछित समझते हैं। समाज के 80% बालक ऐसी सोच रखते हैं। और वह अपने को ही तुच्छ समझते हैं। वे समझते हैं कि उनको कोई नहीं चाहता ।

और वह शारीरिक व मानसिक रूप से पूर्ण तरह सक्षम होते हुए भी अपने को हीन व कमजोर मानते हैं। ऐसे बालकों की संख्या अधिक होती है यदि इन पर ध्यान ना दिया जाए तो वह पूर्णतः सामाजिक रुप से असमायोजित बालक बन जाते हैं।

2-सामाजिक विशेषताएं-

पड़ोस एक बालक को समायोजित बनाने में कारण हो सकता है। गरीबी एक टूटा परिवार, मित्रों का गंदा समूह आदि ऐसे कारण हैं जो बालक को एक अच्छा सामाजिक प्राणी बनने से रोकते हैं। परंतु कभी-कभी उच्च समाज में भी जहां सभी आर्थिक साधन उपलब्ध हैं ऐसे बालक मिलते हैं । मित्रों का प्रभाव इन पर पड़ता है। सामाजिक रूप से पिछड़े बालक कार्य करने के बारे में एक नई विधि अपनाते हैं। गरीब समाज में मित्रों व समूह का प्रभाव अधिक पड़ता है। उस समूह में विशेष रुप से जैसे साथी होते हैं वैसा ही व्यवहार छात्र सीखता है। वह समाज के अवांछित तत्व (अपराधी) बन जाते हैं। छोटे-छोटे झूठ बोलना जैसे- चोरी, अपराध बढ़ते-बढ़ते इनको पूर्णता सामाजिक रुप से अवांछनीय तत्व बना देते हैं।

3-शारीरिक विशेषतायें-

जो बालक अपराधी होते हैं अथवा विद्यालय जाने के बजाय बिना छुट्टी के अनुपस्थित रहते हैं या उपचारात्मक होते हैं वह प्रायः किशोरावस्था के होते हैं । शारीरिक रूप से लड़कों की संख्या लड़कियों से अधिक होती है इनकी समस्याएं भी अवस्था के अनुसार भिन्न भिन्न होती हैं शरमन के कुछ विशेषताएं इस प्रकार बताई हैं मानसिक झल्ला हट नकारात्मक व्यवहार बच्चों की तरह वांछनीय व्यवहार नहीं करते हैं झगड़ालू प्रवृत्तियां हीनता की भावना विद्यालय ना जाना तथा कानून विरोधी कार्य करना आदि।

ग्रंथि असंतुलन भी सामाजिक असमायोजन का कारण हो सकता है क्योंकि ग्रंथि के आवश्यकता से अधिक हार्मोन निकालने पर आवश्यकता से कम हार्मोन निकालने पर बालक का शारीरिक विकास यथोचित नहीं हो सकता। इसे वह अपने को साधारण बालकों से भिन्न समझने लगता है उनके क्रियाकलापों में भाग लेने पर उसे झिझक होती है। सामाजिक रुप से असमायोजित बालक प्रायः टॉन्सिलाइटिस, दांतों की बीमारी, जुकाम आदि बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं।

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4- मनोवैज्ञानिक विशेषताएं

सामाजिक रूप से समायोजित बालक की बुद्धि लब्धि प्रायः 85 या इससे कम होती है। इनमें तार्किक चिंतन की शक्ति कम होती है। चिंता, मनोविकार, संदेह, स्नायुविक तनाव, हिस्टीरिया, स्पीडन व प्रेम हीन भावना आदि गुण ऐसे बालकों में पाए जाते हैं। यह बालक कहीं भी समायोजित नहीं हो पाते बल्कि चिंता मनोविकार तनाव हिस्टीरिया से घिरे रहते हैं। यह शारीरिक रूप से तो स्वस्थ दिखते लेकिन मानसिक रूप से अस्वस्थ रहते हैं।क्योंकि इनकी विचार सिलता व क्षमता कम होती जाती है और यह तनाव में अधिक रहते हैं। शारीरिक व मानसिक विकारों के कारण इनकी स्थिति विचित्र होती है। कभी-कभी यह बुद्धि का उपयोग भी नहीं करते और संवेगात्मक रूप से भी अशांत होते हैं ।

5-शैक्षिक विशेषताएं-

ऐसे बालकों का विद्यालय का इतिहास और असंतोषजनक अवांछित घटनाओं से भरा होता है। ऐसे बालक कई स्कूल बदलते हैं। शैक्षिक उपलब्धि निम्न होती है। यह स्कूल तथा अध्यापक से घृणा करते हैं । स्कूल छोड़ देना पसंद करते हैं उनके मित्र बहुत कम होते हैं। इन्हें इच्छित मित्रता नहीं मिल पाती। लेकिन इसका मूल कारण सामाजिक व आर्थिक होता है। क्योंकि बालक स्कूल जाने, फीस, ड्रेस रखने व लिखने पढ़ने की सामग्री के लिए सम्मिलित रहता है । और तब वह स्कूल के अन्य बच्चों के साथ समायोजन नहीं कर पाता। क्योंकि वह सभी संपन्न परिवारों से से होते हैं। उन्हें वह सम्मिलित नहीं कर सकता और हंसी का पात्र बन जाता है। इस कारण से कक्षा के अन्य बच्चों से चिढ़ना आरंभ कर देता है। वह उनके साथ दुर्व्यवहार करने लगता है, और किसी को मित्र बनाना पसंद नहीं करता।

Socially Maladjusted Children सामाजिक असमायोजित बालक

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सामाजिक असमायोजित बालकों के लिए शैक्षिक प्रावधान

सामाजिक रुप से असमायोजित बालकों के लिए समायोजन के लिए विद्यालयों को प्रमुख रूप से उत्तरदाई माना जाता है। जबकि इसके साथ ही परिवार का व अभिभावक का भी पूरा उत्तरदायित्व होता है। जिससे उनकी शिक्षा को सुचारू रूप से चलाया जा सके क्योंकि विद्यालय में बालक केवल 6 से 8 घंटे तक ही रहता है जबकि घर में अभिभावकों के बीच वह 12 से 18 घंटे तक रहता है । और वहां उसके और समायोजन संस्कारों शिक्षा आदि को परिष्कृत किया जा सकता है। इसके लिए विशेष स्कूल की स्थापना भारत जैसे देश में सामान्य बात नहीं है । सामाजिक रूप से असमायोजन बालक के लिए स्कूल अधिक योगदान दे सकता है उनके सुधार के लिए कुछ निम्नलिखित सेवाएं दी गई है-

  • सामान्य कक्षा अध्यापक का कार्य है कि वह सामाजिक रुप से असमायोजित बालक को पहचाने तथा उसके दोस को बढ़ने से रोके।
  • एक परामर्शदाता की नियुक्ति करनी चाहिए ताकि जब अध्यापक की समझ में ना आए कि क्या करें? तो वह सहायता दे सके।
  • मनोवैज्ञानिक व डॉक्टर से सलाह लेते रहना चाहिए।
  • एक विशेष कक्षा का प्रबंध करना चाहिए ताकि वहां पर सुधारात्मक पर विधियों का प्रयोग किया जा सके।
  • एक विशेष विद्यालय की स्थापना की जाए जैसे कि शिकागो टीरोयत तथा न्यूयॉर्क में है।
  • आवासी विद्यालयों का निर्माण करना चाहिए इन का भार राज्य सरकारें उठा सकती हैं।
  • क्योंकि शैक्षिक योजना की सफलता पाठ्यक्रम, अध्यापकों की कुशलता कथा श्रवण दृश्य सामग्री आदि पर निर्भर करती है अतः इन की ओर ध्यान देना अनिवार्य है।

 

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