सम्प्रेषण में भाषा के उचित उपयोग का सिद्धान्त । Principle of proper use of language in communication.

भाषा के उचित उपयोग का सिद्धान्त

सम्प्रेषण में भाषा के उचित उपयोग का सिद्धान्त । Principle of proper use of language in communication.

सम्प्रेषण में भाषा को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है-

1-भाषा की स्पष्टता –

सम्प्रेषण की भाषा जटिल नहीं होनी चाहिए । भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे सम्प्रेषण प्राप्तकर्ता आसानी से समझ सके। सम्प्रेषणकर्ता को सम्प्रेषण प्राप्तकर्ता के भाषायी स्तर का उचित ज्ञान होना चाहिए । लच्छेदार भाषा में अंतर की जानकारी सम्प्रेषणकर्ता के लिए बहुत महत्व रखती है।

2- विचारों की सुसंबद्धता-

संप्रेषित की जाने वाली सामाग्री में भावों तथा विचारों की क्रमबद्धता तथा तालमेल होना चाहिए। विचारों में एकता होने से सम्प्रेषण प्राप्तिकर्ता उन्हें आसानी से समझ सकता है।

3- सुरलहर का अनुपालन –

भाषा को प्रभावी बनाने के लिए उपयुक्त सुर , लय, भाव तथा ताल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

4-संक्षिप्तता-

किसी भी विचार अथवा भावना को इधर-उधर , घुमा – फिराकर अथवा बहुत लम्बी – चौड़ी भूमिका बनाकर सम्प्रेषण करना उचित नहीं है। इस प्रकार सम्प्रेषण प्राप्तकर्ता भूल – भूलाइया में पड़ सकता है।

कहा जाता है, “संक्षिप्तता अभिव्यक्ति की आत्मा होती है।” विचारों को स्पष्ट भाषा में थोड़े शब्दों में कहने से प्रभाविकता बढ़ जाती है।

सम्प्रेषण में भाषा के उचित उपयोग का सिद्धान्त । Principle of proper use of language in communication.

सम्प्रेषण के प्रकार की दृष्टि से सम्प्रेषण मे संक्षेप इस प्रकार हैं-

1- अशाब्दिक – मुख मुद्रा, आँखों की भाषा

2-शाब्दिक- मौखिक अथवा लिखित रूप में,

3- वाणी या ध्वनि संकेत

4- संकेतात्मक कूट या गुप्त भाषा।

सम्प्रेषण में भाषा के उचित उपयोग का सिद्धान्त । Principle of proper use of language in communication.

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सम्प्रेषण की आवश्यकता एवं महत्व-

सम्प्रेषण संस्था के उद्देश्य की प्राप्ति मे सहायक है। यह उसके विकास और उत्तरोत्तर उन्नति की ओर ले जाने में सक्षम है। अतः प्रबन्धक और प्रशासन की दृष्टि से उपयोगी है और संगठन को प्रभावशाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। सम्प्रेषण को आवश्यकता एवं महत्व को हम निम्नलिखित रूप में व्यक्त कर सकते हैं-

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1-विचारों के आदान – प्रदान में सुविधा-

सम्प्रेषण के माध्यम से प्रधानाध्यापक , शिक्षक , छात्र , कर्मचारी एवं अन्य अधिकारीगण के मध्य विचारों का,भावों का सूचना का आदान-प्रदान सुगमता से हो जाता है। निर्धारित समय और उपयुक्त व्यक्ति को उपयुक्त सूचना मिलने से इसकी प्रभावशीलता में वृद्धि होती है। और विकास को उत्तरोत्तर उन्नति के शिखर पर पहुंचाने का प्रयास संभव हो पता है।

2- विरोधी विचारधाराओं की समाप्ती-

सम्प्रेषण के द्वारा एक-दूसरे के मन में बैठी विरोधी विचारधारा समाप्त हो जाती है। जो व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति मन में कटुता बनाए रखते हैं, सम्प्रेषण उस कटुता को दूर करता है। इस प्रकार विकास का एक सौहार्दपूर्ण वातावरण बनता है। इससे सम्प्रेषण की उपयोगिता में वृद्धि होती है।

3- संस्था के उद्देश्य की प्राप्ति मे आपसी सहयोग-

सम्प्रेषण अधिकारी और कर्मचारी के मध्य फैली गलतफहमियों को दूर करता है । दोनों आपस में बातें करके अथवा सूचना के आदान-प्रदान से एक दूसरे के साथ सहयोग कने को तत्पर हो जाते हैं। और अधिकारी भी कर्मचारी हित पर ध्यान देने लगते हैं। इस प्रकार संस्था का विकास संभव हो पता है और सम्प्रेषण की सार्थकता स्वयं सिद्ध हो जाती है।

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4- विभिन्न क्षेत्रों मे समन्वय की स्थापना-

जो संस्थाएं विस्तार की दृष्टि से अत्यधिक बड़ी होती हैं उनके एक नहीं अनेक विभाग होते हैं और ये सब विभिन्न क्षेत्रों में बटे होते हैं। ऐसी स्थिति में सम्प्रेषण के द्वारा इनमें समन्वय (एकीकरण) हो जाता है। और पहले से अधिक कार्य को विस्तार देकर विकास के ओर अग्रसर किया जाता है।

इस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय से विकास की गति बढ़ जाती है और इससे सम्प्रेषण की उपयोगिता स्पष्ट होती है।

5-प्रबंधन को शक्तिशाली बनाना –

सम्प्रेषण में प्रबंधन और प्रशासन शक्तिशाली बनते हैं। आपसी विचार – विमर्श से, उचित सुझाव से विविध समस्याओं एवं कठिनाइयों का समाधान खोज लिया जाता है। समस्या का समाधान खोजना प्रबंधन को शक्तिशाली बनाने में सहायता करता है। इससे सम्प्रेषण की उपयोगिता में वृद्धि होती है।

6- अपनत्व की भावना का विकास-

सम्प्रेषण के द्वारा प्रबन्धक और कर्मचारी में आपस में विश्वास बढ़ता है उयर यह विश्वास ही कर्मचारी में कार्य के प्रति और अंततः संस्था के प्रति समर्पण के भावना पैदा करता है।वह संथा के कार्यों को स्वयं के कार्य समझने लगता है। इस प्रकार सम्प्रेषण से अपनत्व की भावना का विकास होता है। यह भवन ही सम्प्रेषण की उपयोगिता को सिद्ध करती है।

7- नेत्रत्व क्षमता का विकास-

सम्प्रेषण के माध्यम से नेत्रत्व क्षमता विकसित होती है। एक-दूसरे के हितों का ज्ञान होने से संगठन बनता है। यह संगठन किसी एक व्यक्ति द्वारा संचालित होता है। यह व्यक्ति सम्प्रेषण के द्वारा अधिकांश को उनके हित को सामने रखते हुए अपने अनुयायी तैयार करता है। इससे सम्प्रेषण की उपयोगिता में और अधिक वृद्धि होती है।

अतः स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है की सम्प्रेषण विभिन्न दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कम से कम समय में अधिक कार्य कराने में सक्षम बनाता है। सम्पूर्ण कार्य विधि को अच्छी व्यवस्था देता है, सबमें मिल-जुलकर कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। और स्वयं के हित के साथ संस्था के हित को भी आगे बढ़ाने में सहायता करता है। अतः सम्प्रेषण अत्यंत महत्वपूर्ण हैयर और विशेष उपयोगी है।

प्रभावी सम्प्रेषण के प्रमुख कारक

संस्था में मानवीय संसाधनों , प्रधानाध्यापक ,शिक्षक, छात्र,कर्मचारी तथा अन्य अधिकारी वर्ग आदि के बीच सही सम्प्रेषण से इनके विकास की गति तीव्र होती है और विविध प्रकार की समस्याओं का समाधान होता है। इसलिए सम्प्रेषण की प्रभावशीलता को बढ़ाने पर ध्यान देने की अवशयकता होती है। यह ध्यान हम निम्नलिखित रूप में देकर सम्प्रेषण को प्रभावी बना सकते है-

1-कक्षांतर्गत सम्प्रेषण में छात्र सहयोग-

कक्षा में शिक्षक अधिगम प्रक्रिया की सफलता सम्प्रेषण पर निर्भर करती है। यह प्रक्रिया द्विमार्गी होनी चाहिए, अर्थात छात्र कक्षा मे केवल मूक दर्शन ही नहीं रहना चाहिए अपितु उसे भी अपने विचारों , तथ्यों आदि के प्रदर्शन का अवसर मिलना चाहिए। अतः कक्षा मे शिक्षक और छात्र के मध्य परस्पर भावों और विचारों के आदान -प्रदान से सम्प्रेषण की प्रभावशीलता बढ़ती है।

2-द्रश्य-श्रव्य साधनों का प्रयोग-

शिक्षक उपकरण प्रयोग करने से शिक्षण रुचिकर बन जाता है। छत्रों की रुचि के अनुसार शिक्षण हों से आसानी से ग्रहण कर लिया जाता है। अतः द्रश्य -श्रव्य साधनों का प्रयोग करके सम्प्रेषण को और अधिक लाभकारी एवं प्रभावी बनाया जा सकता है।

3- पाठ्य-सहगामी क्रियाओं का आयोजन-

पाठ्य सहगामी क्रियाओं के आयोजन से बालक के विचारों, भावों और कौशलों का सम्प्रेषण भली-भांति हो जाता है। वातावरण भाय मुक्त हो जाता है। इस भाय मुक्त वातावरण मे छात्र की शंका का समाधान सुगमता से हो जाता है। यह सब सम्प्रेषण के उचित प्रयोग द्वारा संभव हो पाता है। अतः सम्प्रेषण के उचित प्रयोग करने से पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ सहायता करती है, इससे सम्प्रेषण की प्रभावशीलता में वृद्धि होती है।

4-परामर्श सेवा का आयोजन-

परामर्श सेवा के आयोजन से छत्रों की समस्या से परिचय होता है, उनकी रुचि एवं क्षमता का पता चलता है। इससे छात्र और परामर्श दाता के मध्य विचारों का आदान-प्रदान निःसंकोच होता है। फलस्वरूप सम्प्रेषण की प्रभावशीलता बढ़ती है और परिस्थिति के अनुसार उचित मार्गदर्शन प्रदान कर छत्रों की सही विकास की ओर उन्मुख किया जाता है।

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